महिला बीड़ी श्रमिकों पर वैश्वीकरण का प्रभाव -एक अध्ययन (रीवा नगर के संदर्भ में)
वेद प्रकाश तिवारी
शोधार्थी (समाजशास्त्र), शास टी.आर.एस. महाविद्यालय, रीवा (म.प्र.)
’ब्वततमेचवदकपदह ।नजीवत म्.उंपसरू
बीड़ी उद्योग क्योंकि एक कुटीर उद्योग है इस कारण इस उद्योग में महिलाओ का योगदान अधिक होता है। तथा वह घर पर ही कच्चा माल लाकर बीड़ी निर्माण कार्य करती है। महिला श्रमिको की स्थिति काफी शोचनीय है क्योंकि महिलाओं का विकास नही हो पाता तथा वह घर पर ही घरेलू कार्य करके इस कार्य को करने लगती है। तथा वह की दुनिया से अनभिज्ञ रहती है। इसी कारण वह आज भी पिछड़े लोगो में गिने जाते है। और ज्यादातर महिलाए अशिक्षित होती है। इसके साथ अशिक्षित महिलाए कम मजदूरी पर भी कार्य करती है क्योंकि उन्हे इस बात का ज्ञान नही होता है कि सरकार से मजदूरी कितनी निर्धारित कि है। और ठेकेदार इस बात का नाजायज फायद उठाता है। तथा कम मजदूरी में अधिक बीड़ी निर्माण करवाता है। छटनी में कई बीड़िया निकाल देता है। ठेकेदार 1000 बीड़ी में 100 बीड़ी छटनी करते समय निकाल देता है। इसका मूल्य 5 रूपये काटता है। इसके अलावा तेंदू पत्ती कम देना, तम्बाकू कम देना इत्यादि तरीके से ठेकेदार महिलाओ का शोषण करते है। तथा अनपढ़ या कम पढ़े लिखी होने के कारण उन्हे अपने अधिकारो एवं सरकार द्वारा निर्धारित मजदूरी के बारे में नही जानकारी होती है।
बीड़ी श्रमिक, आर्थिक स्थिति, वैश्वीकरण।
प्रस्तावना
रीवा नगर के बीड़ी व्यवसाय में कार्यरत महिला श्रमिको की सामाजिक स्थिति अत्यन्त दयनीय है क्योंकि वें न ही पढ़ी लिखी होती और उन्हे अपने समाज से निकलकर बाहर जाने की इच्छा की होती है।
अगर वह अन्य कार्य करना भी चाहती है तो उन्हे उपेक्षा की नजर से देखा जाता है। अतः ये महिलाए अपने आप को उपेक्षित एवं शोषित महसूस करती हैं। इन महिलाओं को उच्च वर्ग के लोग या पढ़े लिखे लोग उपेक्षा की नजर से देखते है। वे महिलाए उपेक्षा के डर से भी उसी कार्य को जीवन पर्यान्त तक करती रहती है। बीड़ी व्यवसाय का कार्य जीवन पर्यान्त तक करती रहती है और अपने बच्चो का भी इसी कार्य में लगती हैं इससे उनकी सामाजिक स्थिति सुधरती नही है। वह जहां है वही पर रह जाती है।
शोधार्थी द्वारा रीवा नगर के बीड़ी महिला श्रमिको के आर्थिक एवं सामाजिक स्थिति का गहराई से अध्ययन किया है, आजादी के 65 वर्षो के बाद भी समाज का यह वर्ग अपने आप को उपेक्षित एवं शोषित महसूस करता है इनका सम्पूर्ण जीवन, जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं, रोटी, कपड़ा और मकान के चारो ओर घूमता है और समाप्त हो जाता है।
महिला वर्ग के सामने सबसे बड़ी मजबूरी अपने परिवार की पालन-पोषण की होती है। चूकि कम पढ़ी-लिखी होने के कारण वह अन्य व्यवसाय नही कर सकती इसलिए वह बीड़ी निर्माण करना प्रारंभ कर देती है। इसके अलावा अन्य व्यवसाय में प्रशिक्षण एवं पूॅंजी की आवश्यकता होती है। जो उसके पास उपलब्ध नही होता है चूॅंकि बीड़ी व्यवसाय में पूॅंजी की आवश्यकता नही ठेकेदार इन्हे कच्चा माल उपलब्ध करता है। तथा बीड़ी निर्माण के बाद इन्हे मजदूरी देता है। इसी कारण ज्यादातार महिलाओं को झुकाव बीड़ी निर्माण कार्य की होता हैं बढ़ती बेरोजगारी, बढ़ती महंगाई इत्यादि के कारण वह बीड़ी निर्माण का कार्य करती है।
थामस के अनुसार “श्रम से शरीरिक व मस्तिष्क के उन समस्त मानवीय प्रयासों का बोध है, जो कि परिश्रम पाने की आशा से किये जाये।”
इस प्रकार श्रमिक मानवीय प्रयासों से संबंधित है, ये प्रयास शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार के हो सकते हैं। इन प्रयासों का उद्देश्य शारीरिक या मानसिक लाभ प्राप्त करना होता है। यह लाभ शारीरिक मानसिक लाभ अप्रत्यक्ष या प्रत्यक्ष पूर्णतः या शाब्दिक किसी भी रूप में हो सकता है।
रीवा नगर मध्यप्रदेश के उत्तर पूर्वी भाग में स्थित है। पहले रीवा राज्य में से विख्यात था। रीवा नगर का प्रसिद्ध नाम नर्मदा नदी के प्राचीन नाम रेवा पर आधारित है रीवा नगर रीवा राज्य की राजधानी थी, राज्य का नाम भी रीवा पड़ा था। इसके आसपास के भूखण्ड को रेवा भूखण्ड कहते है यहाॅ की अपनी सामाजिक संस्कृति ऐतिहासिक परम्परायें इकसे महत्व को प्रतिपादित करती है रीवा नगर का मानचित्र परम्परायें इसके महत्व को प्रतिपादित करती है रीवा नगर का मानचित्र समद्विबाहु त्रिभुज के समान है रीव नगर का निर्माण नदियों द्वारा लाई गयी मिट्टी से हुआ है रीवा नगर के धरातल का ढाल कैमूर श्रेणी से विन्ध्य श्रेणी तक सामान्य रूप से दक्षिण के उत्तर की ओर है। प्रस्तुत लघुशोध प्रबन्ध के जो निष्कर्ष सामने आये है वे इस प्रकार से है -
ऽ रीवा नगर में बीड़ी उत्पादन एक ऐसा व्यवसाय है जो कुटीर उद्योग के अन्तर्गत आता है। तथा इसे ज्यादातर महिलाएॅ करती है। परन्तु इस व्यवसाय में महिला श्रमिकों को कम मजदूरी प्राप्त होती है। अतः उनका शोषण होता है। रीवा नगर में बीड़ी बनाने वाली महिलाओं में अधिकतर महिलाएॅ 25-65 वर्ष की है तथा ज्यादातर महिलाएॅ अनपढ़ है और जो पढ़ी भी तो वह 5वीं से लेकर 9वीं तक ही पढ़ी है। अनपढ़ होने के कारण उन्हें सरकार द्वारा चलायी गयी सुविधाओं के बारे में जानकारी नहीं होती है। उन्हें बीड़ी रेट की भी ठीक से पता नहीं होता है तथा जितनी मजदूरी मैनेजर देता वह उतने में ही संतुष्ट होती है।
ऽ विगत 10 वर्षो में चयनित 200 परिवारों को तंेदूपत्ते के संग्रह के कार्य में औसतन 33 व्यक्तियों को 15 दिवस का अंशकालिक रोजगार प्राप्त हुआ इनके द्वारा अभी तक 4152 गड्डी तेंदूपत्ते की तोड़ाई की गई जिससे इनको रू. 724560 की आय प्राप्त हुई। तथा इन्हीं बोनस के रूप में भी 15715 राशि प्राप्त हुई। पत्ती तोड़ने वालों श्रमिकों का बीमा भी करवाया गया है। जिसका प्रीमियम सरकार द्वारा करवाया जाता है। पत्ती तोड़ाई के समय इस कार्य में लगे श्रमिकों के साथ आकस्मिक दुर्घटना होेने पर इन्हीं बीमा कम्पनीया द्वारा सहायता एवं मुआवजा दिया जाता है।
ऽ रीवा नगर में 2005 से 2010 में जहाॅ तेंदू पत्ता संग्रहण 400 थी वहीं 2010-12 में बढ़कर 450 हो गयी तथा 2014, 2015, 2016 तक बढ़कर 750 हो गयी थी तथा 2017 में बढ़ाकर 950 हो गयी है।
ऽ रीवा नगर की बीड़ी व्यवसाय में कार्यरत महिला श्रमिको की कमाई का 30.00 प्रतिशत भोजन पर व्यय करती है। सर्वेक्षण किए बीड़ी श्रमिक दवाईयों पर 10 प्रतिशत व्यय करते है। मकान किराए पर भी व्यय करना पड़ता है। महिला श्रमिका मकान के किराए पर 10.00 व्यय करती है। रोशनी पर व्यय 5.00 प्रतिशत है। ज्यादातर महिलाए शिक्षा के महत्व समझती है तथा वह अपने बच्चों को पढ़ाना चाहती है इसलिए उनका एडमीशन प्राईवेट या सरकारी स्कूलों में करवा दिया है। शिक्षा पर महिला श्रमिकों की कमाई का 20 प्रतिशत खर्च होता है। अपने तथा परिवार के कपड़ों पर अपनी कमाई का 10 प्रतिशत व्यय करता है। अन्य व्यय में वह व्यय आते है। जो अचानक किसी के शादी-ब्याह पर जाना हुआ, कोई मेहमान पर आ जाता है, आदि अन्य व्यय में आते है, अन्य व्यय के रूप में महिला श्रमिक अपनी कमाई का 5 प्रतिशत व्यय करते है।
बीड़ी श्रमिकों पर वैश्वीकरण का प्रभाव
विभिन्न सामाजिक समूहों एवं वर्गों पर वैश्वीकरण का गहरा प्रभाव पड़ा है, विशेषकर बीड़ी श्रमिक वर्ग को इस प्रक्रिया ने बहुत दयनीय स्थिति में ला दिया है। विश्व के देशों का बड़े पैमाने पर आर्थिक एकीकरण के फलस्वरूप मजदूरों की सुरक्षा, संरक्षण एवं उनके कल्याण के व्यापक विधिक ढांचे में बदलाव आया और वे उद्योगपतियों एवं पूंजीपतियों की शर्तों के अधीन हो गये हैं। बीड़ी श्रमिक कानून का कोई भी महत्व नहीं रह गया और वैश्वीकरण की प्रक्रिया ने बीड़ी श्रमिकों को असहाय सिथति में ला दिया है।
वस्तुतः बीड़ी श्रमिक कानून का विस्तृत ढांचा इसलिए खड़ा किया गया था कि बीड़ी श्रमिकों के हितों, स्वास्थ्य एवं सुरक्षा की गारंटी दी जा सके। अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (प्स्व्) ने इस संदर्भ में बीड़ी श्रमिकों के लिए ’सुगम्य कार्य की धारणा पर बल दिया था किंतु वैश्वीकरण की संरचना एवं प्रक्रिया ऐसी रही है कि उसका बीड़ी श्रमिकों एवं बीड़ी श्रमिक युग पर बड़ा बुरा प्रभाव पड़ा। कार्य एवं उत्पादन की ढ़ीली-ढाली बाजारू प्रवृतियों ने वैशिवक स्तर पर असमानता, बेरोजगारी, असुरक्षा आदि में बड़े पैमाने पर वृद्धि की। राज्य को कमजोर करने की प्रवृति ने समुचित कार्य की धारणा को कमजोर कर दिया (त्मककल रू 2005 रू 2)।
बीड़ी श्रमिकों पर वैश्वीकरण के प्रभाव के संदर्भ में, इसके प्रति आशंकाएं भी हैं और अपेक्षाएं भी। उल्लेखनीय है कि वैश्वीकरण की प्रक्रिया के परिणामस्वरूप जहां बड़े पैमाने पर विस्थापन व बेरोजगारी बढ़ी है, सामाजिक सुरक्षा में कमी र्हुइ है, वहां अर्थव्यस्था के विविधिकरण से रोजगार के अवसर, आय में वृद्धि, कार्य के मानवोचित्त दशाओं की व्यवस्था को इसके दूरगामी लक्ष्य के रूप में देख सकते हैं। फिर भी विद्वानों के बीच इस बात को लेकर एकमतता है कि वैश्वीकरण के परिणामस्वरूप आरंभिक तौर पर बीड़ी श्रमिक वर्ग को सबसे ज्यादा क्षति पहुंची है।
वैश्वीकरण के फलस्वरूप बीड़ी श्रमिकों के नुकसान के तथ्य पर विकसित एवं विकासशील देशों के मजदूर एवं मजदूर संघों ने ध्यान आकृष्ट किया है। विकसित देशों में इसका संबंध आउटसोर्सिंग एवं पूंजी के स्थानान्तरण से है। बेरोजगारी में वृद्धि के अतिरिक्त, खतरा सामाजिक कूड़ेदान के सृजन का भी है जो विकासशील देशों में निम्न कार्य परिसिथतियों के अन्तर्गत निर्मित वस्तुओं का विकसित देशों के साथ निर्यात की सिथति में उत्पन्न हो सकता है। इतना ही नहीं, विकसित एवं विकासशील देशों की व्यापारिक प्रतिस्पद्र्धा तथा निम्न स्तरीय बीड़ी श्रमिक स्तर के कारण उत्पाद वस्तुओं में गिरावट का भी भय है। भारत जैसे विकासशील देशों में वैश्वीकरण के परिणामस्वरूप मौजूदा उद्योगों में रोजगारों में कमी र्हुइ। वैश्वीकरण की मांग बाजारू शकितयों के सुदृढ़ किए जाने की है। विकासशील समाजों की अर्थव्यवस्थाओं ने व्यापक पूंजी निवेश, विशेषकर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिए बीड़ी श्रमिक कानूनों के महत्व को कम कर दिया है, श्रम का कोई महत्व नहीं रह गया वो मनमानी शर्तों के अधीन हो गया। रोजगार सुरक्षा एवं सामाजिक सुरक्षा के तथ्य की अनदेखी की गई है। समग्रतः इसने रोजगार की गुणवत्ता का ह्रास कर दिया है (च्ंचवसं रू 2004 रू 541)।
शोध उद्देश्य:-
शोध कार्य रीवा (म.प्र.) में बीड़ी-श्रमिकों की समस्याओं पर आधारित है इस समस्या के समाधान हेतु संविधान में लिखित मूल अधिकारों व नीति निर्देशक तत्वों एवं संवैधानिक प्रावधानों के व्यवस्थाओं का अध्ययन सम्मिलित किया गया है।
शोध कार्य का उद्देश्य बीड़ी श्रमिकों की वर्तमान स्थिति का एक विश्लेषण करना।
बीड़ी श्रमिकों की वैवाहिक स्थिति की जानकारी प्राप्त करना।
बीड़ी श्रमिकों के रहन-सहन एवं आवासीय व्यवस्था के बारे में जानकारी प्राप्त करना।
बीड़ी श्रमिकों के आर्थिक राजनैतिक, व्यवहारिक एवं सामाजिक समस्याओं का अध्ययन करना।
विषय की गहनता एवं महत्व के परिपेक्ष्य में प्रस्तावित शोध का व्यापक उद्देश्य रीवा (म.प्र.) के बीड़ी श्रमिकों की पारिवारिक समस्याओं का मूल्यांकन करना।
शोध में उन कार्यो को चिन्हित करना जिसके परिणाम स्वरूप बीड़ी श्रम वर्तमान समय में एक व्यापक समस्या बन गयी है।
शोध परिकल्पनाएँ:-
शीर्षक से सम्बन्धित शोधार्थी की प्रमुख प्राकल्पनायें निम्नलिखित है:-
बीड़ी श्रमिक के शिक्षा स्तर पर कोई सार्थक अन्तर नहीं पाया जायेगा।
बीड़ी श्रमिक में स्वास्थ्य स्तर में कोई सार्थक अन्तर नहीं पाया जायेगा।
बीड़ी श्रमिकों के बेतहासा वृद्धि का कारण अभी पारिवारिक समस्याएँ जिम्मेदार नहीं मानी जायेगी।
श्रमिकों के कल्याण के लिए चलायी गयी विभिन्न योजनाओं के कारण बीड़ी श्रमिकों की संख्या में कमी पाई जायेगी।
अध्ययन का महत्व:-
भारत में बीड़ी-श्रमिकों की समस्या राष्ट्र के समक्ष दृष्टिगोचर हो रही है, प्रमुख समस्याओं में से एक गरीबी, जनसंख्या विस्फोट, निरक्षरता व कमजोर आर्थिक स्थिति के कारण देश के शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों में धन कमाने के लिए लगा दिया जाता है। जहाँ इन बच्चों को शारीरिक एवं मानसिक शोषण होता है एवं उनकी एक बड़ी संख्या शिक्षा प्राप्ति के अभाव में रह जाती है। जिस पीढ़ी को देश का भविष्य माना जाता है उनकी एक बड़ी संख्या न तो विद्यालय जा पाती है और न ही अपने बचपन को देख पाती है। बीड़ी-श्रमिकों की समस्या के समाधान हेतु समाज के सभी वर्गों द्वारा सामूहिक प्रयास किये जाने की आवश्यकता है।
अध्ययन क्षेत्र का परिचय:-
क्षेत्र निर्धारण इस युग कि मौलिक समस्या है क्षेत्र निर्धारित हो जाने से विषय सीमाओं में बंध जाता है और इसका अध्ययन तुलनात्मक दृष्टि से कम हो जाता है, भौतिक विभागों के क्षेत्र में कठिनाई नहीं आती है इसका कारण यह है कि भौतिक घटनाएँ मूर्त होती है और उन पर आसानी से प्रयोग किये जा सकते हैं। सामाजिक अनुसंधान के क्षेत्र में निर्धारण में जो कठिनाई आती है वह यह है कि इनका सम्बन्ध अमूर्त और प्रयोग रहित होता है।
प्रस्तुत अध्ययन ‘‘बीड़ी श्रमिकों पर वैश्वीकरण का प्रभाव ’’ रीवा नगर के सन्दर्भ में तैयार किया गया है।
शोध प्रविधि:-
मानव एक जिज्ञासु प्राणी है वह अज्ञात तत्वों का पता लगाने की दिशा में निरन्तर आगे बढ़ता जा रहा है। सामाजिक घटनायें भी अपने आप में काफी जटिल है एक ही घटना के पीछे अनेक कारण हो सकते हैंै, उन सभी कारणों को खोज निकालना कोई सरल कार्य नहीं है। जब सामाजिक क्षेत्र की समस्याओं के हल खोजने का व्यवस्थित प्रयास किया जाता है, उसे ही सामाजिक अनुसंधान, शोध अन्वेषण या खोज का नाम दिया जाता है।
शोध कार्य में बीड़ी श्रमिकों की पारिवारिक समस्याओं से सम्बन्धित वास्तविक एवं विश्वसनीय आंकड़ों को प्राप्त करने के लिये प्राथमिक एवं द्वितीयक दोनों प्रकार के आंकड़ों को एकत्र कर पूर्ण किया गया है। प्राथमिक आंकड़े स्वयं कार्य स्थल पर जाकर मूल स्रोतो एवं साक्षात्कार अनुसूची द्वारा एकत्र किये गये हैं। जबकि द्वितीयक आंकड़े बीड़ी-श्रमिकों से संबंधित विभिन्न प्रकाशित- अप्रकाशित पुस्तकों, शोध पत्र-पत्रिकाओं, समाचार पत्रों, शासकीय प्रतिवेदनों आदि से एकत्र कर प्रयोग किये गये हैं।
तथ्यों का सारणीयन विश्लेषण एवं व्याख्या -
शोधार्थी द्वारा किया गया कोई भी शोघ कार्य सही अर्थों में तभी प्रभावी होते है, जब शोधार्थी द्वारा उस समस्या की वास्तविक स्थिति का मूल्यांकन किया जाये। इसके लिये यह आवश्यक है कि शेाधार्थी द्वारा शोध अध्ययन मेें उपयोग किये गये समस्त शोध उपकरण द्वारा प्राप्त जानकारियों को व्यवस्थित क्रम में सारणीबद्ध किया जाये।
शोध क्षेत्र में बीड़ी-श्रमिकों के पारिवारिक समस्याओं हेतु शेाधार्थी ने कुछ शोध उपकरणों की सहायता ली है, जिसके द्वारा एकत्रित तथ्यों का सारणीयन, विश्लेषण एवं व्याख्या द्वारा वस्तु स्थिति की जानकारी प्रस्तुत की गयी है। जो इस प्रकार है-
उपर्युक्त सारणी से स्पष्ट है कि 100 बीड़ी-श्रमिक परिवारों में से 72 प्रतिशत श्रमिक परिवार ऐसे है जो एकल परिवार की श्रेणी में आते हैं, जबकि 28 प्रतिशत परिवार ऐसे है जो संयुक्त परिवार की श्रेणी में आते है। इस प्रकार रीवा नगर के बीड़ी श्रमिक परिवारों मंे से दो तिहाई एकल स्वरूप के है। अतः हम कह सकते है कि रीवा नगर में भी संयुक्त परिवार के स्वरूप में तेजी से परिवर्तन हो रहा है।
उपर्युक्त सारणी से स्पष्ट है कि रीवा नगर के 100 बीड़ी श्रमिकों में से 52 श्रमिक परिवारों में 3 व्यक्ति कार्य करते हैं जबकि 23 श्रमिक परिवारों मंे 4 और 25 श्रमिक परिवारों में 5 व्यक्ति कार्य करते है। इस प्रकार से स्पष्ट है कि परिवार में 3 सदस्यों के कमाने की संख्या सबसे अधिक है जबकि 4 सदस्यों के कमाने वाली संख्या सबसे कम अर्थात् 23 है।
उपर्युक्त सारणी से स्पष्ट है कि रीवा नगर के 100 बीड़ी श्रमिकों में से सिर्फ 7 बीड़ी श्रमिकों का ही स्वास्थ्य अच्छा ह,ै जबकि 19 बीड़ी श्रमिकों का स्वास्थ्य समान्य है। दो तिहाई श्रमिक अर्थात 74 प्रतिशत बीड़ी श्रमिकों का स्वास्थ्य खराब पाया गया है। अतः निम्न सारणी से ज्ञात होता है कि रीवा नगर के बीड़ी श्रमिकों के स्वास्थ्य की स्थिति अत्यन्त निम्न है क्यांेकि अधिकतर बीड़ी-श्रमिक किसी न किसी छोटी-मोटी बिमारी के शिकार है।
उपर्युक्त सारणी से स्पष्ट है कि 100 बीड़ी-श्रमिक में से लगभग 42 बीड़ी श्रमिकों में से लगभग आधे पर बीड़ी-श्रमिकांे की मासिक आय 1300 से 1350 रूपये है जबकि 26 बीड़ी श्रमिकों की मासिक आय 1250 से 1300 रूपये तक है। 15 बीड़ी श्रमिकों की आय 1350 से 1400 रूपये तक है और 11 बीड़ी श्रमिकों की मासिक आय 1400 से 1450 रूपये तक है। 1450 से 1500 रूपये मासिक आय वाले बीड़ी-श्रमिकांे की संख्या मात्र 6 है इस प्रकार स्पष्ट है कि लगभग दो तिहाई बीड़ी-श्रमिक ऐसे है जिनकी मासिक आय 1300 से 1350 रूपये तक है।
उपर्युक्त सारणी से स्पष्ट है कि 100 बीड़ी श्रमिकों में से 64 प्रतिशत बीड़ी श्रमिकों को शासन द्वारा चलायी जा रही योजनाओं का लाभ नहीं मिला जबकि 36 प्रतिशत बीड़ी श्रमिकों को शासन द्वारा चलायी जा रही योजनाओं का लाभ मिला जिससे बीड़ी श्रमिकों की संख्या में कुछ हद तक कमी पायी गयी।
उपर्युक्त सारणी से स्पष्ट है कि 100 बीड़ी श्रमिकों में से 53 बीड़ी-श्रमिकांे के माता-पिता द्वारा अपने बच्चों को न पढ़ा पाने के कारण आर्थिक तंगी है, जबकि 47 बीड़ी-श्रमिको के माता पिता अपने बच्चों को अज्ञानता के कारण शिक्षा नहीं दिलाते हंै। वे शिक्षा के महत्व को बिल्कुल नहीं समझते हैं। उनकी मान्यता है कि पढ़ने के बाद बच्चों को नौकरी मिलेगी ही नहीं अतः व्यर्थ में बच्चों की शिक्षा में खर्च करने से कोई ज्यादा फायदा नहीं होगा अतः वे शुरू से ही अपने बच्चों को रोजगार में लगा देना उचित समझते हैं।
उपरोक्त सारणी से स्पष्ट होता है कि सर्वेक्षण किए गए 200 बीड़ी महिला श्रमिको में से 55.00 प्रतिशत चालको के परिवार की संख्या 2 से 4 के बीच में है, 4 से 5 के बीच संख्या वाले परिवारो का प्रतिशत 30.00 है। 6 से अधिक संख्या वाले परिवार का प्रतिशत 15.00 पाया गया है। ये वे परिवार है जो अभी भी संयुक्त परिवार में रहते है। रीवा नगर में बीडी निर्माण का कार्य करने वाले ज्यादातर रीवा नगर के मोहल्ले की महिलाए है जो बेरोजगारी एवं गरीबी से तंग आकर बीड़ी व्यवसाय में कार्यरत हो जाती है। बीड़ी निर्माण की महिला श्रमिको के सर्वेक्षण के दौरान एक तथ्य सामने आया कि रीवा नगर में अशिक्षित की महिला श्रमिको संख्या बहुत ही अधिक है।
बीड़ी उद्योग में कार्यरत महिलाओ श्रमिको के बच्चो की शैक्षणिक स्थिति
उपरोक्त सारणी के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि बीड़ी मजदूर अपने बच्चो को शिक्षित करने के पक्ष में है क्योंकि 90.00 प्रतिशत बीड़ी श्रमिको के बच्चे स्कूल जाते है और मात्र 10.00 प्रतिशत बीड़ी मजदूरो के बच्चे स्कूल नही जाते हैं बीड़ी मजदूरी करते हैं इनके आवास में भी भिन्नता पाई गई। बीडी श्रमिको के आवास से संबंधित जो सूचनाए सर्वेक्षण के दौरान प्राप्त हुई वे निम्न सारणी से स्पष्ट है।
देश को बीड़ी श्रमिकों के समस्याओं से, मुक्ति दिलाने के लिए अभी तक किये गये प्रयासों और उनसे मिले परिणामों के अनुभवों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि इस महत्वपूर्ण अभियान के समक्ष अनेक चुनौतियाँ या समस्याएँ है। जिनके निराकरण की योजना बनाने के लिए पहले इन चुनौतियों और समस्याओं के बारे में गहनता से अध्ययन कर लेना चाहिए और बाद में उनके समाधान हेतु कोई व्यवहारिक या सैद्धान्तिक नियमों का निर्माण करना चाहिए। बीड़ी श्रमिकों के उत्थान की दिशा में अभी तक के अनुभवों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि बीड़ी श्रमिकों के सम्बन्ध मेें सरकारी संगठनों स्वैच्छिक संस्थाओं, औद्योगिक प्रतिष्ठानों अथवा अन्तर्राष्ट्रीय एजेन्सियों आदि द्वारा प्रकाशित आंकड़ों में बहुत कुछ भिन्नता देखने को मिलती है। इनमें ज्यादातर आंकड़े तो पूर्वाग्रहों से ग्रसित भी बताये जाते हंैं। अतः इस समस्या के निराकरण की योजना बनाने से पूर्व आवश्यक है कि इस सम्बन्ध में बिल्कुल स्पष्ट आंकड़े एकत्रित किये जायें। इस कार्य के लिए सरकार को कुछ प्रतिष्ठित एवं विश्वसनीय स्वयं सेवी संस्थाओं की सहायता लेनी चाहिए। बीड़ी श्रमिकों की ठीक-ठीक संख्या उनकी आयु, पारिवारिक स्थिति, शैक्षणिक स्तर, स्वास्थ्य कार्य करने की स्थिति, वेतन एवं पारिश्रमिक दरें आदि की स्पष्ट सूचनाएँ संकलित की जानी अपरिहार्य है, तभी उनके पुनर्वास अथवा कल्याण की योजनाओं का निर्माण और उनको मूर्त रूप प्रदान किया जाना सम्भ्भव हो सकेगा।
रोजगार पर वैश्वीकरण के प्रत्यक्ष प्रभाव ने रोजगार सृजन एवं रोजगार के अवसर के विस्तार के वायदों की कर्लइ खोल दी है। रोजगार में वृद्धि सिर्फ गैर कृषिगत क्षेत्र एवं असंगठित क्षेत्रों में र्हुइ है जिसका कोई भविष्य नहीं है। ऐसे क्षेत्रों में न तो बीड़ी श्रमिकों की सामाजिक सुरक्षा की व्यवस्था है, और न ही उनके लिए मानवोचित वातावरण तैयार किए जाने पर बल दिया जाता है। भारत के असंगठित एवं अनौपचारिक संगठन को उदाहरण के तौर पर देखा जा सकता है। औद्योगिक विवाद अधिनियम से बचाव के लिए औधोगिक जगत में संविदात्मक (ब्वदजतंबजनंस) रोजगार दिए जाने पर भारत में ज्यादा बल दिया जा रहा है।
उपर्युक्त परिस्थितियों में कार्यदशा एवं रोजगार सुरक्षा की विधिक व्यवस्था के कारण नियोक्ता बीड़ी श्रमिकों को रोजगार दिए जाने से कतराते हैं, क्योंकि ये प्रावधान बीड़ी श्रमिकों को नियमित रोजगार भी प्रदान करते हैं एवं उचित काम तथा उचित पारिबीड़ी श्रमिक पर भी बल देते हैं। अतः यह तर्क दिया जाता है कि ऐसे प्रावधान को खत्म कर दिया जाना चाहिए। इस तर्क में दो बातों की अनदेखी हो जाती है। प्रथम, पारिबीड़ी श्रमिक के न्यूनतम स्तर का निर्धारण और दूसरा, अतीत का तिक्त अनुभव जो बीड़ी श्रमिकों को रहा है।
शोधार्थी ने शोध के दौरान पाया कि नगर में बीड़ी श्रमिकों परिवार स्वास्थ्य एवं शिक्षा से सम्बन्धित कई समस्या दृष्टिगोचर हो रही थी। रीवा नगर में कागजी आंकड़ों की तुलना में कई गुना व्यापक है, क्योंकि रीवा जिले में कुल श्रमिकों की संख्या कार्यालय ़परियोजना, राष्ट्रीय बाल श्रम परियोजना, जिला रीवा से प्राप्त 11967 है जबकि यह संख्या 13116 के आसपास है जिसमें से सिर्फ नगर में श्रम करने वाले बीड़ी श्रमिकों की संख्या लगभग 2175 के करीब है। रीवा नगर के बीड़ी व्यवसाय में महिला श्रमिको की स्थिति दयनीय है अतः इसके लिए सरकार ने भी कदम उठाये है जैसे बीड़ी श्रमिकों के लिए बीड़ी अस्पताल का निर्माण करवाया जिसमें मुफ्त इलाज तथा मुफ्त दवाइयाॅ प्रदान की जाती है। बीड़ी मजदूरों के बच्चों को अधिक छात्रवृत्ति देने की व्यवस्था सरकार द्वारा की गई है। तंेदू पत्ता संग्राहकांे को भी जीवन बीमा योजना के तहत अनेकों प्रकार की सुविधाऐें प्रदान की गई है।
सुझाव किसी भी शोध अध्ययन का महत्वपूर्ण अंग होता है शोधार्थी अपने शोध अध्ययन के निष्कर्षों के आधार पर शोध कार्य के उपरान्त जो तथ्य प्रकट करता है वही सुझाव है बीड़ी-श्रमिक को शोध अध्ययनों के परिप्रेक्ष्य में सुधारात्मक सुझावों का विशेष महत्व होता है क्योंकि इन्हीं सुझावों के आधार पर शोध समस्या से सम्बन्धित व्यक्तियों को मार्गदर्शन मिलता है। अतः शोधार्थी ने अपने शोध अध्ययन के आधार पर बीड़ी श्रमिकों के कल्याण सम्बन्धी कुछ सुझाव दिये हैं। बीड़ी श्रमिकों की समाज शास्त्रीय अध्ययन में सुझाव के तौर पर बिन्दुवार समझाने का प्रयास किया गया है:-
1. इन्हें सरकार द्वारा चलाये गये योजनाओं का ग्रामीण स्तर पर पहुँचाया जाय।
2. सररकार को ग्रामीण स्तर पर बीड़ी श्रमिक के समस्याओं का कैम्प लगाकर निवारण किया जाय।
3. बीड़ी श्रमिकों को समय-समय पर कृषि के वैज्ञानिक तरीको का जानकारी दी जाय।
4. बीड़ी श्रमिक प्राय अशिक्षित होते है, जिनको शिक्षा के माध्यम से मजबूत बनाया जाय।
5. बीड़ी श्रमिकों के पास आर्थिक समस्या बहुत आती है, इसलिये निशुल्क ऋण उपलब्ध कराई जानी चाहिये।
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Received on 10.06.2019 Modified on 18.06.2019
Accepted on 25.06.2019 © A&V Publications All right reserved
Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2019; 7(2): 599-605.